अप्रैल 2005 का कच्चा चिट्ठा

कच्चा चिट्ठा स्तंभ में हर माह परिचय कीजिये नये चिट्ठाकारों से। इस अंक में आपकी भेंट करवा रहे हैं “मेरा चिट्ठा” के लेखक चिट्ठाकार आशीष गर्ग और “नुक्ताचीनी” चिट्ठे के लेखक और निरंतर के प्रकाशक देबाशीष चक्रवर्ती से।

आशीष गर्ग

आशीष गर्गमेरा चिट्ठा के लेखक आशीष गर्ग बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। इनका जन्म 13 सितम्बर 1973 को (कायमगंज, जिला फर्रूखाबद, उ.प्र.) मे हुआ था। बचपन वही बीता। फिर 9 साल कायमगंज में रहने के बाद, 3 साल तक पुखंरायां (कानपुर देहात) मे रहे, फिर उसके बाद कानपुर में। प्रारम्भिक पढाई कानपुर मे करने के बाद वे फिर निकल लिये एन.आई.टी नागपुर से धातुकर्म अभियांत्रिकी में स्नातक करने, फिर मूड फ्रेश करने के लिये एक साल तक टाटा स्टील मुंबई मे नौकरी की। अब ज्यादा दिन नौकरी में मन नहीं लगा फिर निकल लिये बंगलोर भारतीय विज्ञान संस्थान से परास्नातक करने। अब तो आप लोग भी समझ गयें होंगे कि पढाई और नौकरी तो सिर्फ बहाना था, इनको तो अलग अलग शहरों मे घूमने का शौंक था। फिर इनका पहली बार भारत के बाहर जाना हुआ, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (इंग्लैंड) पी.एच.डी के लिये। करीब दो साल वहां नौकरी करने के बाद, कानपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में सहायक प्राख्याता के पद पर कार्यरत है, अब आगे का इनको नही पता तो हमे क्या पता होगा क्योंकि ये है एक नम्बर के घुमक्कड़ प्रवृत्ति के। इनका मन लगता है रिसर्च में, खेलकूद में, दुनिया घूमने में और पढ़ने में, खासक्रर हिन्दी की किताबें (मधुमुस्कान और लोटपोट इनकी पसंदीदा किताबें थीं)।

आशीष के पसंदीदा कवि जयशंकर प्रसाद है। आशीष के चिट्ठो मे आप सामाजिक बुराइयों के प्रति आक्रोश को पायेंगे, समाज मै फैली असमानता, अशिक्षा, भ्रष्टाचार,अमीरों की शोषण नीति,अमीरी का दिखावा,एक दूसरे के प्रति असहिष्णुता और असंवेदना को देखकर आशीष काफी दुखी होते है। शायद ब्लाग लिखने की प्रेरणा इनको इन्ही कुरीतियों से मिली। आशीष का ब्लाग समाज मे फैली कुरीतियों पर प्रत्यक्ष कटाक्ष करता है।

“करोड़ों अरबों के आई आई आई टी बनाने से, बेहतर होगा कि हम अच्छे पांलीटेक्निक और आई टी आई बनायें, ऐसे लोग जो कि सचमुच में इंजीनियेरिंग करते हैं”

साथ ही आशीष भारत मे अंग्रेजी के वर्चस्व और हिन्दी की दुर्दशा को लेकर भी काफी व्यथित रहते है, लेकिन इन्हे आशा है दिन बदलेंगे, इनके शब्दों मे

“हिन्दी की देश में दुर्दशा को देख कर मन खिन्न हो जाता है पर उम्मीद बरकरार है कि एक दिन हम अंग्रेज़ीदां लोगों को हिन्दी का सम्मान करते देखेंगे।”

आशीष मेरा चिट्ठा के अतिरिक्त हिन्दी के प्रथम विज्ञान ब्लाग ज्ञान विज्ञान के भी लेखक है, यह ब्लाग वैज्ञानिक उपलब्धियों और जानकारियों का खजाना है। आशीष स्वयं अपने आप मे हिन्दी चिट्ठाकारी के एक अनमोल रत्न है, और हमे आशा है कि ये अनमोल रत्न हिन्दी चिट्ठाकारी को और उँचाइयों तक ले जायेगा। उनके लेखन और हिन्दी चिट्ठाकारी मे योगदान के लिये हमारी हार्दिक शुभकामनायें।


देबाशीष चक्रवर्ती

देबाशीष चक्रवर्तीजन्म से बनारसी देबाशीष चक्रवर्ती का लालन पालन भोपाल में हुआ, पिता सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भेल में यहीं कार्यरत रहे और यहीं बस भी गए। माताजी लखनऊ की हैं। मनचाही मंज़िल की तलाश में यायावर मन ने कई राहें पकड़ीं। अखबारों में संपादक के नाम पत्र से शुरुवात हुई, स्कूल व कॉलेज की पत्रिकाओं के संपादक मंडल में रहे और बस मुगालते में आ गए कि लेखक बन सकते हैं सो वैद्युत अभियांत्रिकी में ईंजीनियरिंग के बाद जा पहुँचे नईदुनिया में, पर एक माह में ही सत्य से साक्षात्कार हो गया जब तनख्वाह बताई गई महज़ 500 रु माहवार। हालांकि फीचर लेखन जारी रहा नवभारत, नई दुनिया, भास्कर, जागरण, देशबंधु, क्रॉनिकल, फ्री प्रेस सभी के लिये लिखा। कॉलेज में मित्र के साथ भित्ती पत्रिका (वॉल मैगेज़ीन) की नींव डाली। 6 साल वैद्युत उत्पादनों का विपणन किया, सारा मध्यप्रदेश नाप लिया, गुना से बैलाडिला तक। सन 2000 में यह नौकरी छोड़ चल पड़े सूचना प्रोद्योगिकी की राह, इंदौर, मुम्बई और संप्रति पुणे। 2002 में एफएम रेडियो में यूँ ही भाग्य आजमाया, चुने गए पर फिर पारिश्रमिक पर बात नहीं बनी। आजकल रेडियो सुनते हैं तो लगता है अच्छा ही किया, रचनात्मक लेखन की गुंजाईश ही कहाँ रखी व्यावसायिक वरीयताओं ने।

देबाशीष ने पहले भी कई जालस्थल बनाए। अक्टुबर 2002 से ब्लॉगिंग कर रहे हैं। हिंदी बेल्ट में रहे तो भाषा के प्रति रूझान स्वाभाविक था। नौ दो ग्यारह देख कर पहले एक मित्र को उकसाया और फिर स्वयं शुरु कर दी नुक्ता चीनी। उनकी कृति चिट्ठा विश्व से समुदाय संभवतः और करीब आया। फिर अनुगूँज, बुनो कहानी, निरंतर आदि इत्यादि। देबाशीष डीमॉज़ पर संपादक हैं और चिट्ठाकारों की निर्देशिका भी संपादित करते हैं और साथ ही वेबरिंग और समूह फीड भी अद्यतन रखते हैं। भारतीय ब्लागिंग की बात हो और इन्डीब्लॉगीज़ का उल्लेख ना हो ऐसा कैसे हो सकता है। पूरे दो साल तक ब्लॉगमंडल मे इन्डीब्लॉगीज़ का हल्ला मचा रहा, देश मे ब्लागिंग के प्रति लोगों को आकर्षित करने मे इन्डीब्लॉगीज़ ने महती भूमिका निभायी। जब खोज की गयी तो पता चला कि इसके सूत्रधार देबाशीषजी है।

मित्र इन्हें देबू, चक्कू दादा आदि नामों से पुकारते हैं। देबु दा मूलतः अंर्तमुखी हैं, नपातुला बोलते हैं पर बेहद चंचल मन के हैं। बड़बोलेपन, दिखावे, धोखेबाज़ी और झूठ से सख्त नफरत है। वैसे तो अन्याय के खिलाफ कई बार आवाज़ उठायी और खामियाज़ा भी भुगता पर साधारण शादीशुदा मर्दों की तरह बीवी के अन्याय के सामने घिघ्घी बंध जाती है। लेखन के मामले में आजकल एक नंबर के आलसी हो गये हैं सो जालस्थलों के साथ ब्लॉग भी अक्सर सज़ा भुगतते रहे हैं। लेखन के अलावा संगीत का बेहद शौक है, कुछ लोगों ने इन की गर्दभ तान पर इनाम भी दे दिये। पहले टी.वी और सिनेमा के भी खासे मुरीद थे अब काफी कम देखते हैं। मिताली और तन्मय के अलावा इन्हें पसंद है छुट्टी के दिन सुबह देर तक सोना और अपना P-IV कम्पयूटर। जीवन में आकांक्षाएँ अलग अलग रहीं, कभी गायक बनना चाहते थे तो कभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जाना, कभी फिल्मकार तो कभी लेखक। अब जब आई.टी में ही आ जमे हैं तो बस यहीं रम जाना चाहते हैं। दोस्तों का मानना है: “ये जहाँ कहीं भी रहे, अंर्तजाल पर हिन्दी की गतिविधियों के सूत्रधार के रूप मे हमेशा मौजूद रहेंगे।”

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