भारतीय समाज और भ्रष्टाचार

निरंतर के जुलाई 2005 अंक का संपादकीय

क्या

भ्रष्टाचार हम भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है? और क्या हम कभी इससे स्वतंत्र हो पाएँगे?

नज़रियादो नम्बर के पैसे पर थोड़ा लगाम कसने के उद्देश्य से, वर्ष 2005 के वित्त विधेयक में, हर 10000 रुपए की नक़द निकासी पर दस रुपए का कर जब वित्त मंत्री पी। चिदम्बरम ने लगाना चाहा, तो हर तरफ हल्ला मच गया। सदन में चिल्ल-पों के बीच वित्त मंत्री ने इस कर को यह कह कर उचित ठहराने की भी कोशिश की कि एटीएम की कतार में लगने से बचने के लिए आप उसके दरबान को यूँ ही दस रुपए देते हैं।

वित्त मंत्री की यह बात परोक्ष रूप से इस बात का इशारा करती है कि भ्रष्टाचार और घूसखोरी आम भारतीयों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। अब अगर वे चाहें तो भी इससे निजात नहीं पा सकते। भारत के भूतपूर्व प्रधान मंत्री स्व.राजीव गांधी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके थे कि भ्रष्टाचारियों के कारण देश के विकास के लिए जारी हर एक रूपये में से सिर्फ पंद्रह पैसा ही सही जगह पहुँच पाता है।

भारत के भूतपूर्व प्रधान मंत्री स्व.राजीव गांधी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके थे कि भ्रष्टाचारियों के कारण देश के विकास के लिए जारी हर एक रूपये में से सिर्फ पंद्रह पैसा ही सही जगह पहुँच पाता है।

गुरचरण दास ने दैनिक भास्कर के अपने कॉलम में अभी-अभी ही अपने एक मित्र का किस्सा बयान किया है। उनका वह अनिवासी भारतीय मित्र अमेरिका के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर है, जहाँ कि कई नोबल पुरस्कार प्राप्त फैकल्टीज़ भी हैं। उस मित्र ने भारत और भारतीय विद्यार्थियों की सेवा के लिए उस विश्वविद्यालय की एक शाखा भारत में खोलनी चाही। इसके लिए उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालय एसोसिएशन को अर्जी दी। जाहिर है, अर्जी का कोई जवाब उन्हें नहीं मिला। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के अधिकारियों के साथ उनकी बैठक का नतीजा रिश्वत की मांग के रूप में सामने आया। यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय में उनका आवेदन धूल मिट्टी खाता रहा। हार कर उनके मित्र ने चीन में उस यूनिवर्सिटी का कैंपस खोलने का निश्चय किया है, और कहा है कि भारत से कोई आशा नहीं की जा सकती।

भारत से कोई आशा क्यों नहीं की जा सकती? बिलकुल की जा सकती है। बस, आपको इसके लिए भ्रष्ट होना पड़ेगा। रिश्वतखोरी अपनानी होगी। अगर गुरचरण दास के वह मित्र रिश्वत बांट देते तो उनके यूनिवर्सिटी का कैंपस भारत में फल-फूल रहा होता। भारत में बाढ़ राहत के नाम से जारी करोड़ों रुपयों से अपने लिए बंगले और प्रापर्टी खरीदने वाले आईएएस अफसर एशियन हीरो के पुरस्कार से नवाज़े जाते हैं। ग़रीब गुरबों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के मात्र 100 रूपये प्रति महीने दी जाने वाली राशि को भी भ्रष्ट भारतीय अधिकारी और कर्मचारी गबन करते हैं। परीक्षा के परचे फिर से जाँचने में धांधली कर रुपए कमाते हैं। अपने कुनबे को मस्टररोल पर रख कर शासन को चूना लगाते हैं। रक्षा सौदों में रशियन भाषा को दोष देते हुए खरीदी आदेशों में एक शून्य बढ़ा कर हजार का माल लाख में खरीद लिया जाता है। मंत्री पुत्र की शादी के लिए अफसरों से अवैध वसूली की जाती है।

कुल मिलाकर यहाँ भारत में हर संभावित स्थल से, हर संभावित भ्रष्ट तरीके से जब रूपया आसानी से कमाया जा सकता है तो फिर, भारत से आशा क्यों नहीं की जा सकती? भारत ने बहुतों की आशाओं को पूरा किया है। और कर रहा है। यही वजह है कि भारत में जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा छूटा नहीं है, जहाँ भ्रष्टाचार ने अपने कदम नहीं रख छोड़े हों। भ्रष्टाचार आपके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। इसे आप नकार नहीं सकते। स्थिति यह है कि इसके बगैर, संभवत: आपका जीवन असंभव नहीं, तो अति कठिन तो है ही।

पर, क्या हमें यह यथा स्थिति स्वीकारनी चाहिए? कतई नहीं। आज भारतीय समाज के लिए एक और स्वतंत्रता आंदोलन की, एक और सम्पूर्ण क्रांति की ज़रूरत है। भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने की, स्वस्थ और स्वच्छ समाज को फिर से रचने की, आज घोर ज़रूरत है। सोन चिरैया को वापस उसके घरौंदे में ला बिठाने का समय आ चुका है। इस आंदोलन का बिगुल बजाया जाना चाहिए। आइए उम्मीद करें, और यह प्रार्थना भी, कि भारत में गांधी सा कोई महात्मा शीघ्र अवतरित हो। जो इस नए स्वतंत्रता आंदोलन का सूत्रपात कर भारतीयों की जड़ को जकड़ चुके भ्रष्टाचार से स्वतंत्रता दिलाए।

आमीन

लेखक रविशंकर श्रीवास्तव निरंतर के संपादक मंडल के सदस्य हैं।

कितनी स्वतंत्रता हो सामुदायिक अंतर्जाल पर

अं

ग्रेज़ी की कहावत है, “टू मैनी कुक्स स्पॉइल द ब्रॉथ”, यानी एक ही व्यंजन को बनाने के लिए कई लोगों को लगा दिया जाए तो उस का बुरा हाल ही होगा। शायद यही हुआ लॉस ऍञ्जिलिस टाइम्ज़ के विकिटोरिल प्रयोग के साथ, जो बड़ी धूम से शुरू तो हुआ पर कुछ दिनों में ही बन्द हो गया।

“ब्लॉग” की तरह “विकी” भी इंटरनेट पर अपेक्षाकृत नया शब्द है। हवाइयन भाषा के शब्द विकी-विकी, जिस का अर्थ है जल्दी-जल्दी, से लिया गया यह शब्द “विकी” अन्तर्जाल पर एक और क्रान्ति का वाहन बन गया है। विकी साइट ऐसी साइट होती है, जिसे आप न सिर्फ पढ़ सकते हैं, बल्कि बड़ी आसानी से बदल भी सकते हैं। यानी आप किसी विकी साइट पर कोई लेख पढ़ते हैं और उस पर दी गई सूचना आप को अपर्याप्‍त लगती है, या त्रुटिपूर्ण लगती है, तो बजाय लेख के लेखक को लिखने के आप स्वयं लेख को बदल ड़ालते हैं। इस तरह का तन्त्र साझे प्रकल्पों के लिए बहुत बड़ा वरदान है, जिस में कई लोग संसार के विभिन्न कोनों में बैठ कर एक ही लेख को मिल कर पूरा कर सकते हैं। विकी के सफल प्रयत्‍नों में मुख्य है विकिपीडिया, जो एक बहुभाषीय ज्ञानकोष है, विकशनरी जो एक बहुभाषीय शब्दकोष है, विकीन्यूज़, जहाँ आप समाचार लिख सकते हैं। मीडियाविकी, जो कई विभिन्न विकी प्रकल्प बनने में सहायक हैं, का नारा है “..क्योंकि विचारों को चाहिए आज़ादी”।

हम यही आशा कर सकते हैं कि अन्तर्जाल पर गुंडों मवालियों की संख्या के मुकाबले उन का वर्चस्व रहेगा जो रचनात्मक कार्य करते हैं

पर जहाँ स्वतन्त्रता है, वहाँ स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करने वाले भी हैं। पिछले दिनों अमरीका के एक प्रमुख समाचार पत्र लॉस ऍञ्जिलिस टाइम्ज़ ने एक निराला प्रयोग किया, और उस का नाम रखा विकिटोरियल यानी विकी सम्पादकीय। यह अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ के उप-सम्पादक माइकल न्यूमैन के दिमाग़ की उपज थी। उन के अनुसार उद्देश्य था इंटरनेट पर अखबार के पाठकों को मौका देना “साझे ढ़ंग से सत्य की खोज” का। इस के अन्तर्गत, पत्र के सम्पादकीय को खुला छोड़ा गया ताकि पाठक उसे बदल सकें। सम्पादकीय की मूल प्रति तो अपने स्थान पर रही, पर उस की एक और प्रति रखी गई लोगों की छेड़छाड़ के लिए। जैसा अपेक्षित था, सम्पादकीय के मूल स्वरूप की पहचान समाप्‍त होने में देर नहीं लगी। लगभग एक हज़ार पाठकों ने सम्पादकीय को बदलने के लिए रजिस्टर किया। कुछ ने विभिन्न शब्दों पर कड़ियाँ जोड़ीं, एक ने तो सम्पादकीय को ही आधा कर दिया। पर ज़ोर का झटका तब लगा जब कुछ पाठकों ने अश्लील चित्र ड़ालने शुरू कर दिए। हार कर अखबार ने विकिटोरियल को “अस्थाई रूप से” बन्द कर दिया, उन लोगों का धन्यवाद देते हुए जिन्हों ने सही मानसिकता के साथ इस प्रयोग में भाग लिया। हम तो यही गुनगुना सकते हैं कि, “…यह तो होना ही था”।

आज़ादी की राहें खोलने वालों और आज़ादी का ग़लत फायदा उठाने वालों का यह चूहे-बिल्ली का खेल तो सदियों से चलता आया है और आगे भी चलता रहेगा। यदि आप घर में खुली हवा आने के लिए खिड़की-दरवाज़े खुले छोड़ना चाहते हैं तो जल्द ही चोर-लुटेरों का ड़र आप को मजबूर करेगा सींखचे लगाने के लिए, या फिर खिड़की-दरवाज़े बन्द करने के लिए। अन्तर्जाल पर वाइरस, वर्म, स्पैम, पॉर्न, स्पाइवेयर यह सब इसी बीमारी के लक्षण हैं। पर हम यही आशा कर सकते हैं कि अन्तर्जाल पर गुंडों मवालियों की संख्या के मुकाबले उन का वर्चस्व रहेगा जो रचनात्मक कार्य करते हैं, नए रास्ते खोलते हैं, नए सॉफ्टवेयर बनाते हैं और चोर उचक्कों की नाक में दम करने के लिए भी नए तन्त्र बनाते हैं। आशा है विकिटोरियल की खिड़की फिर खुलेगी, सींखचे लगने के बाद ही सही।

लेखक रमण कौल निरंतर के संपादक मंडल के सदस्य हैं।

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