जनता द्वारा, जन हित हेतु : विश्व भर में जल की रक्षा

मानवाधिकार बनने की बजाय जल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कमाई का ज़रिया बन गया है

दुनिया भर में ऐसे लोगों के बीच की खाई दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जिनके पास पानी पर्याप्त है और जो पानी को तरस रहे हैं। जल की उपलब्धता बड़ी समस्या है यह तो सभी मानते है पर इस से जुड़ी समस्याओं के हल पर आपसी सहमती और समन्वय न के बराबर है। प्रकृति की नेमत जल जो दरअसल एक मानवाधिकार होना चाहिये बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कमाई का ज़रिया बन गया है। प्रस्तुत आलेख में अमरीका स्थित “पब्लिक सिटिज़न्स वॉटर फॉर ऑल” नामक अभियान की निर्देशिका वेनोना हॉटर कह रही हैं कि पानी जैसी मूल सेवाओं में निजी निवेशक को नहीं वरन् नागरिकों की सीधी भागीदारी को बढ़ावा मिलना चाहिए।
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श्व में करोड़ों लोगों के लिए घर में नल खोल कर स्वच्छ, सुलभ जल प्राप्‍त करने का विचार भी एक स्वप्न के समान है। परन्तु अमरीका जैसे देशों के लिए, जहाँ लोग दिन में दर्जनों बार नल चलाते हैं, पानी न होने का विचार असंभव सा है। तो आइए, स्वागत है आप का विश्व जल संकट में, जहाँ एक अरब से अधिक लोगों के पास सही जल तक पहुँच की कमी है, और लगभग आधी धरती पर साफ-सफाई की सुविधा की स्थिति हास्यास्पद है।

जहाँ एक अमरीकी नागरिक अपनी वार्षिक आय का मात्र 0.1% पानी पर खरचता है, वहीं घाना के निवासी को अपनी आय का 25% तक पानी पर व्यय करना पड़ता है।

ताज़े पानी की माँग हर 20 साल में दोगुनी हो जाती है, और इस से जल संकट के और गहराने का अन्देशा है। परिणामस्वरूप, आजकल हर रोज़ 6000 बच्चे जलजनित बीमारियों से मर रहे हैं जिन्हें टाला जा सकता था। पिछले दशक में पानी के मुद्दे पर होने वाले झगड़े फसाद भी बढ़े हैं। अनियन्त्रित औद्योगिक विकास दुर्लभ जल स्रोतों को दूषित करता है, और बचे खुचे संसाधन विलासमय विकास योजनाओं की बलि चढ़ जाते हैं। परिणाम है पानी की बढ़ती कमी और प्रयोक्‍ताओं के लिए बढ़ते दाम, जिस से गरीब परिवार, जो पानी के दाम नहीं दे सकते, दूषित नदियों, नालों और झीलों जैसे असुरक्षित स्रोतों पर निर्भर होने पर मजबूर हो जाते हैं। पानी की महत्ता की कद्र ना करने वाले और पानी के पीछे मारे मारे फिरने वाले लोगों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है।

यद्यपि विभिन्न देशों में पानी के दाम लगभग एक से हैं, पर औसत अमरीकी नागरिक अपनी वार्षिक आय का मात्र 0.1 प्रतिशत पानी पर खर्च करता हैं जबकि अकरा, घाना का निवासी को अपनी आय का 25 प्रतिशत तक पानी पर खर्च करना पड़ता है। कल्पना कीजिए, यदि आप को प्रतिदिन सिर्फ चालीस रुपये की आय पर रहना पड़े, आप अपने परिवार की ज़रूरतें कैसे पूरी करेंगे?

संयुक्‍त राष्ट्र के अध्यक्ष कोफी अनान ने इस वर्ष के विश्व जल दिवस पर कहा, “[जल] मानवीय विकास के लिए, मानवीय मर्यादा के लिए, बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। आइए सारे संसार के लोगों को सुरक्षित, स्वच्छ जल दिलाने के लिए और अधिक प्रयास करने का प्रण करें। और विश्व के उन जल संसाधनों के बेहतर प्रबन्धन के अपने वादे को दोहराएँ जो हमारे अस्तित्व और 21वीं सदी में हमारे शाश्वत विकास की जीवन रेखा हैं।” स्वच्छ सुलभ जल तक पहुँच होने से आर्थिक संवृद्धि, स्थाई विकास, बेहतर स्वास्थ्य और निर्धनता में कमी का रास्ता खुलता है। हालांकि इस समस्या को विश्व भर में आसानी से 21वीं सदी के सब से महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक के रूप में पहचाना और समझा जाता है, इस बढ़ती आपदा को सुलझाने के विषय में कोई सहमति नहीं है। बल्कि, इस विषय पर विभिन्न लोगों की राय में बहुत अधिक भिन्नता है।

एक और पहलू है उन कंपनियों का जो जल प्रदाय के निजीकरण द्वारा जल संकट को “सुलझाने” पर नज़रें गड़ाये बैठे हैं। इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से हैं जर्मनी की आर-डब्ल्यू-ई थेम्ज़ और फ्रान्स स्थित गुट स्वेज़ और वियोलिया। यह कंपनियाँ दावा करती हैं कि केवल वे ही जल संयन्त्रों का क्षमतापूर्वक प्रबन्धन कर सकती हैं। फिर भी, अमरीका के अटलांटा से ले कर फिलिपींस के मनीला तक, जहाँ देखिए वहाँ यह देखने को मिलता है कि निजी जल प्रदायकों ने न केवल ऊँचे दाम वसूले बल्कि जल की गुणवत्ता को भी क्षीण होने दिया है और निवेश करने के अपने वादे भी नहीं निभाये।

जल को “मुक्त बाज़ार” शैली में सौदे की चीज़ बना देना एक ऐसा समाधान साबित हुआ है, जो टिक नहीं सकता। इससे नुकसान उपभोक्ताओं का हुआ और निजी कंपनियों का फायदा। पानी जैसी आवश्यक सामग्री के निजीकरण पर आधारित वाणिज्य की असफलता तो निश्चित ही है। दरअसल पानी को तो मानवाधिकार के रूप में मान्यता देनी चाहिए, न कि बहुराष्ट्रीय नियन्त्रण के तहत किसी सामग्री के रूप में।

बहुराष्ट्रीय जल कंपनियों का बहुत ही खराब रिकार्ड रहा है, यहाँ तक कि उन्होंने सरकारी मामलों में भी टाँग अड़ाने से परहेज नहीं रखा। न्यू ऑर्लीन्ज़ के निवासियों से पूछ कर देखिए, जिन्होंने शहर के जल संयन्त्र के निजीकरण पर पाँच साल के विचार विमर्श के दौरान अपने नगर परिषद में भ्रष्टाचार को पनपते देखा। शुरुआत से ही, पानी के भावी ठेकेदारों ने राजनीतिज्ञों को पैसा पहुँचाना शुरू कर दिया था; यूनाइटेड वाटर (स्वेज़ गुट की कंपनी), और यू.ऍस.फिल्टर (वियोलिया गुट की कंपनी), दोनों ने ही ऐसे स्थानीय वकीलों या कन्सलटंटों की सेवाऐं लीं जिनकी तत्कालीन नगरपालक मार्क मोरियल से साठ-गाँठ थी। (खैर जनता के विरोध के चलते, निजीकरण तो हुआ नहीं, पर बन्द दरवाज़ों के पीछे हुए भ्रष्टाचार की पोल खुलते साल से ज़्यादा लग गया।)

या, फिर पूछिए इंग्लैंड के उन निवासियों से जिनके घरों के पिछवाड़ों में गन्दे नाले बहने लगे, क्योंकि थेम्ज़ वाटर (आर.डब्ल्यू.ई. की कंपनी) का विचार है कि कोई परिवेश के लिहाज़ से दुरुस्त नीति लागू करने के मुकाबले, यही जुर्माना वसूलने का सस्ता तरीका है।

जैसे जैसे जल संकट बढ़ रहा है, वैसे ही आकार ले रहा है एक अन्तर्राष्ट्रीय आन्दोलन जो जल के अधिकार के लिए लड़ रहा है और जल को जनता की भलाई की सामग्री के रूप में मनवाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सन्धि की माँग कर रहा है। इस आन्दोलन की अगुवाई कर रहे हैं समाज के लोग और पर्यावरण सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय संगठन जो इस कीमती और ज़रूरी संसाधन के निजीकरण के विचार का विरोध कर रहे हैं।

प्रयोक्ताओं को जल की रक्षा करने के लिए कदम उठाना होगा बजाय इसके कि वे किसी कंपनी के बोर्डरूम को इसका नियन्त्रण सौंप दें।

पर अभी भी हमें एक अरब लोगों का सामना है जिन्हें पानी सुलभ नहीं है। हमें जल की पूर्ति को सुदृढ़ करना पड़ेगा और हिसाब मांगना पड़ेगा, वितरण मांगना पड़ेगा। हमें अधिक निधिबंधन के लिए प्रयत्न करना होगा, और साथ ही सुनिश्चित करना होगा कि जिन्हें पानी सब से ज़्यादा चाहिए, उन के लिए वह सुलभ हो। जहाँ पानी जैसी मूल सेवाओं की बात हो रही हो, नागरिकों की सीधी भागीदारी को बढ़ावा मिलना चाहिए। जैसे ही निजी निवेशक तस्वीर में आते हैं, उपभोक्ता नकार दिए जाते हैं। कंपनियों की जवाबदेही तो उनके शेयरधारकों के प्रति होती है, ग्राहकों के प्रति नहीं, तो फिर उनको एक जन सुविधा को नियन्त्रित करने देना कौन सी बुद्धिमत्ता है? प्रयोक्ताओं को जल की रक्षा करने के लिए कदम उठाना होगा, और जहाँ ज़रूरी हो वहाँ बदलाव की माँग करनी चाहिए, बजाय इसके कि वे किसी कंपनी के बोर्डरूम को इसका नियन्त्रण सौंप दें।

हमें मांग करनी चाहिए कि सरकार के हर स्तर पर चुने हुए अधिकारी ऐसी नीतियों का समर्थन करें जो पानी के हित में हैं। यह सोचना होगा की निजी क्षेत्र के प्रलाप में हम हय मान लें कि पानी अन्य सामान की तरह एक आम माल है, जबकि पानी एक मूल मानवीय अधिकार है।

हिन्दी रूपांतरणः रमण कौल

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