सीधी बात कहने का क्या किसी में दम नहीं?

टीवी हो, रेडियो या प्रिंट, भारत में यौन विषयों पर बात करने पर हिचक बरकरार है

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ड्स के बारे में एक तथ्य से शायद हर पढ़ा लिखा परिचित हो, और वह है “जानकारी ही बचाव है”। अलबत्ता जानकारी क्या होनी चाहिये यह बिना लागलपेट परोसने में हर माध्यम की घिग्घी बंध जाती है। हमारे समाज में खुले तौर पर और वह भी यौन विषयों पर बात करना टेढ़ी खीर है। चाहे टीवी हो, रेडियो या फिर प्रिंट माध्यम, यह हिचक साफ दिखती है। भारत के एक लोकप्रिय हिन्दी दैनिक में सरकारी विज्ञापन की बानगी देखें,

“कॉन्डोम जरूरी है। कई बार टीवी पे देखा है। अखबारों में पढ़ा है। लेकिन कभी, किसी ने मुझे खुल कर, इसके बारे में कुछ नहीं समझाया। एक दिन जब मैं कॉन्डोम के बारे में छुप कर पढ़ रहा था तो बड़े भैया ने देख लिया। उन्हें सब झट से समझ आ गया। उन्होंने मुझे कॉन्डोम के बारे में अच्छी तरह समझाया। एचआईवी / एड्स और सेक्स के बारे में भी खुल कर बात की। दाद देनी पड़ेगी भैया की। उनकी हिम्मत की। काश सबको ऐसे ओपन-माइंडेड भैया मिलें!”

“मनोरंजक कार्यक्रमों के द्वारा दोहरा फायदा है क्योंकि मनोरंजन के द्वारा शिक्षा मिले तो बात समझ भी बेहतर आती है और देर तक याद भी रहती है।”

हम इस क्रियेटिव माध्यम की कुव्वत या रचनाधर्मिता कि बात अलग रखें तो बात अभी भी चाहरदिवारी के अंदर ही है। पढ़ने वाला अगर जागरूक न हो तो कॉन्डोम क्या है और इसका सही प्रयोग कैसे किया जाता है यह जानकारी इन महंगे विज्ञापन से नहीं मिलती (इसी अंक में पढ़ें – एड्स से कैसे बचा जाय)। सरकार ने बात करना शुरु किया पर असल जानकारी पाने का जिम्मा “ओपन-माइंडेड भैया” पर डाल दिया। तमाम मीडिया एड्स से बचने के ऐसे ही अस्पष्ट संदेशों से अटा पड़ा दीखता है। अलबत्ता यह पता नहीं कि ये विज्ञापन दर्शकों में एड्स के प्रति कोई जागरूकता जगा पाने में सक्षम भी हैं या नहीं।

एड्स जैसी अभूतपूर्व घटना के प्रति प्रतिक्रिया भी अभूतपूर्व होनी चाहिये। लोगों को जानकार बनाने के लिये हर संभव माध्यम और तरीके की भी सहायता लेनी चाहिये। और क्या संदेश कुछ मज़ाकिया ढंग से नहीं दिते जा सकते? थाईलैंड में एड्स एक्टीविस्ट और पूर्व काबिना मंत्री मेचाई वीरवैद्य, जो “काँडोम किंग” के नाम से लोकप्रिय हैं, ने हास्य, जिंगल जैसे अपरंपरागत तरीके से जागरूकता फैलाने का काम लिया। पर भारतीय विज्ञापन एजेंसिया भारत के पाठकों को रुख को देखते हुए ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती, हास्य का शुमार तो दूर की बात है। निरंतर ने कई नामी विज्ञापन एजेंसियों से पूछा कि क्या वे हास्य विनोद को शामिल कर कोई कैंम्पेन बना चुके हैं या बनाने वाले हैं, पर केवल मुद्रा ने ही जवाब दिया और वह भी ना में।

“एक बढ़िया कार्यक्रम जो बढ़िया काम कर रहा है”

Om Puriलोकप्रिय अभिनेता ओम पुरी टी.वी धारावाहिक “जासूस विजय” में दर्शकों के साथ पारस्परिक बातचीत के एक अंश की मेज़बानी करते नज़र आते हैं जिसमें दर्शक केस को सुलझाने में जासूस विजय को भी पछाड़ने का प्रयास करते हैं। एक लिहाज़ से वे कार्यक्रम के सूत्रधार भी हैं। ओम का परिचित और सम्माननीय व्यक्तित्व दर्शक और शो के मध्य संवाद स्थापित करने में मदद करता है।

ओम दर्शकों को एड्स और एच.आई.वी के बारे में खुलकर बोलने और अपने सवाल उन तक भेजने को भी उत्साहित करते हैं। “यह एक बढ़िया कार्यक्रम है जो बढ़िया कार्य कर रहा है।”, ओम पूरी कहते हैं, “मैं भारत में जहाँ भी गया, लोग जासूस विजय के बारे में जानते हैं। हाल ही में लद्दाख गया तो वहाँ देखा कि उत्सुक लोग हस्तचालित जनरेटर चलाकर भी यह कार्यक्रम देखते हैं”।

हालांकि यदाकदा कुछ ऐसे प्रयास हो जाते हैं जिनकी तारीफ करना भी ज़रूरी है। निरंतर एक ऐसे ही प्रयास की अनुशंसा करता है जो भारतीय राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण (नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम) यानि भारानी ने दूरदर्शन और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के साथ संयुक्त रूप से निर्मित किया है।

एड्स के विज्ञापनों का श्रोता वर्ग चाहे जो भी हो संदेशों से दुरुहता कम होगी और बात सीधे सादे तरीके से कही जाय जो “शिक्षा देने” जैसी न लगे तो गले उतरना आसान होता है। भारानी ने शायद यही सोचकर 15‍‌‍‍‍‍‍ से 40 साल के आयुवर्ग पुरुषों के लिये एक ऐसे ही कार्यक्रम की परिकल्पना की (यह आयुवर्ग यौनिक रूप से ज्यादा सक्रीय होता है और इनको एड्स का खतरा सर्वाधिक है)। इसके फलस्वरूप बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट ने दूरदर्शन पर प्रसारण हेतु दो टी.वी कार्यक्रम “जासूस विजय ” और “हाथ से हाथ मिला ” के रूप में शुरु किया देश का सबसे बड़ा एचआईवी एड्स सजगता कार्यक्रम।

जासूस विजय कार्यक्रम की रुपरेखा रोमांचक है, जिसमें ऐक्शन और ड्रामा के द्वारा एड्स की जानकारी, संक्रमण के मार्ग, गुप्त रोग की पहचान व इलाज और काँडोम के फायदों का संदेश दर्शकों तक पहुँचाया जाता है। और यह वाकई असरकारक रहा है, यह धारावाहिक हर महीने करीब 75 लाख लोगों द्वारा देखा जाता हैं। इतना ही लोकप्रिय है ट्रस्ट का बनाया दूसरा कार्यक्रम “हाथ से हाथ मिला” जिसे हर माह 40 लाख दर्शक देखते हैं। “हाथ से हाथ मिला” एक साप्ताहिक रियेलिटी शो के प्रारूप में प्रसारित होता है, हर कथा एक युवा सितारे पर केंद्रित होती है जिसने एड्स की जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। कार्यक्रम में बॉलीवुड के सितारों की भागीदारी भी उल्लेखनीय है।

पर मनोरंजक कारयक्रमों की वजह से कहीं निहित संदेश हंसी में ही इधर उधर तो नहीं हो जाते। बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के युवा कार्यक्रमों की निर्माता प्रियंका दत्त कहती हैं, “मनोरंजक कार्यक्रमों के द्वारा दोहरा फायदा है क्योंकि मनोरंजन के द्वारा शिक्षा मिले तो बात समझ भी बेहतर आती है और देर तक याद भी रहती है।” जासूस विजय सीरियल के मुख्य पात्र विजय को एच.आई.वी पॉसिटिव चित्रित किया गया है, इससे अनायास ही दर्शकों में संक्रमित लोगों के साथ भेदभाव न करने का संदेश पुख्ता रूप में चला जाता है।

Fardeen Khan with Yuva Start Hasina Kharbih in an episode of Haath Se Haath Mila.“हाथ से हाथ मिला” मे बड़े पैमाने पर स्थानीय समुदाय के लिये कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, हाल ही के एक एपिसोड में फिल्म स्टार फरदीन खान ने युवा सितारे हसीना खारबीह को शिलाँग मे रॉक कॉनसर्ट के आयोजन का चैलेंज दिया ताकी मेघालय के युवा एड्स के बारे में जानें।

पर क्या वाकई ये कार्यक्रम उपाय कारगर हैं। व्यूअरशिप ठीक है पर क्या इनके असर को मापा तोला भी गया है। 2005 में बी.बी.सी ने एड्स के ज्ञान, रवैये और व्यवहारों पर एक फील्ड स्टडी की। 2001 के राष्ट्रीय बिहेवियरल सेंटीनल सर्वेलेंस सर्वे के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा सर्वे था। इस सर्वे से पता चला कि, आम तौर पर, टीवी देखने वाले लोगों में, न देखने वालों कि तुलना में एड्स और इससे बचाव के तरीकों के बारे में जागरूकता ज्यादा थी और बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के इन कार्यक्रमों के दर्शकों मे यह जागरूकता कहीं अधिक पायी गई।

बी.बी.सी जासूस विजय की तर्ज पर और कार्यक्रमों पर विचार कर रहा है बस किसी प्रायोजक की तलाश है। संस्थान ने दोनों कार्यक्रमों से संबंधित वेबसाईट्स का निर्माण भी किया है जहाँ पर इन कार्यक्रमों के अलावा एड्स की भी जानकारी उपलब्ध है। एक खास बात है इन जालस्थलों पर उपलब्ध एड्स पर छोटी सी बुकलेट, प्रियंका ने बताया कि यह बुकलेट अब तक 56,000 से ज्यादा लोगों को डाक से भेजी जा चुकी है।

अतिरिक्त सामग्री व सहयोग – देबाशीष चक्रवर्ती

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