संवादडॉक्टर कुलदीप सुंबली (अग्निशेखर) संभवतः न कश्मीर की राजनीति में परिचय के मोहताज हैं, न हिन्दी साहित्य में। हाँ, उन से बात करते समय यह समझ में नहीं आता कि उन के व्यक्तित्व के इन दोनों पहलुओं के बीच की रेखा कहाँ है।

अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में जब अग्निशेखर कश्मीर विश्वविद्यालय में हिन्दी में पी.एच.डी. कर रहे थे, तो उन्होंने शायद सोचा ही न होगा कि नियति उन को नेतृत्व की इस दिशा में धकेल देगी। फिर अस्सी का दशक समाप्त होते होते, कश्मीर घाटी में इनक़लाब सा आ गया — तथाकथित आज़ादी का इनक़लाब। वर्षों से कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित अलगाववाद का जो लावा उबल रहा था, वह ज्वालामुखी बन कर फूट पड़ा। कुछ दिनों के लिए, कुछ शहरों में, लग रहा था कि अलगाववादी अपने मक़सद में कामयाब हो गए हैं। मस्जिदों के लाउड-स्पीकरों से, उर्दू अखबारों में छपी सूचनाओं से एक ही आवाज़ आ रही थी – रलिव या गलिव, (हमारे साथ) मिलो या मरो। ऐसे में कश्मीरी हिन्दू और अन्य भारतवादी आतंक के घेरे में आ गए। कुछ लोगों को निशाना बनाया गया, जिन में गणमान्य लोग भी थे और साधारण लोग भी। कई गाँव के गाँव ऐसे में एथ्निक क्लीन्सिंग की भूमिका बनाए गए, ताकि बाकी भारतवादियों को सबक मिले। लाखों लोगों का एक पूरा समुदाय, जो पीढ़ियों से कश्मीर के अतिरिक्त किसी घर को नहीं जानता था, समूल उखाड़ फेंका गया।

कश्मीरियों के लिए यह अनुभव संभवतः विभाजन के समय पाकिस्तान से आए शरणार्थियों या तालिबान द्वारा अफ़गानिस्तान से भगाए गए हिन्दुओं से कम नहीं था, पर यह इस दृष्टि से भिन्न था कि जहाँ पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से भागे हिन्दुओं को शरणार्थी मान कर मुआवज़ा दिया गया, कश्मीरियों को कभी शरणार्थी नहीं माना गया क्योंकि कश्मीर तो अभी भी भारत का "अटूट अंग" था। कश्मीरियों की वर्तमान पीढ़ी के लिए विस्थापन जीवन भर की वेदना बन गया। इन्हीं लाखों विस्थापितों में अग्निशेखर के परिवार ने भी जम्मू में आकर डेरा डाला। परन्तु व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद, पारिवारिक त्रासदियों के बावजूद, बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के उन्होंने अपने अधिकार के लिए लड़ने का निश्चय किया। तभी अपने कुछ युवा मित्रों के साथ वे राष्ट्रीय समाचार माध्यमों में पनुन कश्मीर (अपना कश्मीर) के कन्वीनर के रूप में अवतरित हुए। पनुन कश्मीर का नारा था, "असि छु तरुन कश्मीर" यानी, हमें (वापस अपने) कश्मीर जाना है। पिछले डेढ़ दशक में उन का संघर्ष कई मरहलों से गुज़रा, और मंज़िल अभी भी दूर है।

अग्निशेखर का इस बीच साहित्य का भी मनन होता रहा। तीन कविता संग्रह छपे – "किसी भी समय", "मुझ से छीन ली गई मेरी नदी", "काल वृक्ष की छाया में"। एक कहानी पर फिल्म भी बनी, उस फिल्म में कैमियो रोल भी किया। हाल में उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार के प्रतिष्ठित सूत्र सम्मान से पुरस्कृत किया गया। वे वेब पत्रिका कृत्या के सम्पादक मंडल में भी शामिल हैं। हाल में निरंतर संपादक दल के सदस्य रमण कौल को जम्मू में अग्निशेखर से मिलने का मौका मिला। प्रस्तुत हैं निरन्तर के लिए उन के साथ किए गए एक विशेष साक्षात्कार के कुछ अंश।

आप के सार्वजनिक जीवन के कई पहलू दिखाई देते हैं — कवि, लेखक, विचारक और विस्थापित कश्मीरियों के नेता। क्या इन सब पहलुओं में आप को किसी विरोधाभास का सामना करना पड़ता है?

Agnishekharकविता रच रहा हूँ, तो जी रहा हूँ। इस में किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। मेरी कविता का केन्द्रीय संवेदन निर्वासन, विस्थापन, निष्कासन है, और यही मेरे जीवन की संवेदना हो गई है। इसी से मुक्ति की कामना, प्रतिरोध का संघर्ष हम छेड़े हुए हैं, जिस में मैं अग्रणी रूप से सक्रिय हूँ और चाहता हूँ कि जिन के साथ हम घाटी में जी रहे थे वे सभी सांस्कृतिक जीवन मूल्य पुनः बहाल हों, सद्भाव हो और धर्म जाति या मौलिक विचारधारा के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो। मुख्यतः पनुन कश्मीर सूक्ष्म स्तर पर यही एक स्वप्न लेकर चलता है। हालाँकि इसकी स्थूल व्याख्याएँ अलग अलग तरह से की जाती हैं। पनुन कश्मीर मेरे लिए सेक्युलरिज़्म की नर्सरी है, जिस में हम इन्हीं जीवन मूल्यों की पनीरी बचाए हुए हैं। आज कश्मीर घाटी में अलगाव और धर्म के आधार पर एक विखंडन की प्रतिक्रिया अपने हिंस्र और बर्बर रूप में चल रही है। मेरे लिए दो ही रास्ते हैं। या तो पराजय स्वीकार कर अपना जीवन यापन करना, या पलट कर इस सब से लड़ना। शब्द और कर्म दोनों से। कबीर, मेरे आदर्श कवि के हवाले से

सुखिया सब संसार है खावै और सोवै
दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै

मेरे जागने और मेरे दुख में जहाँ निविड़ एकान्त, उदास कर देने वाली चुप्पी है वहीं भविष्य में आस्था रखने वाले ऐसे तमाम विस्थापित संस्कृति कर्मी, बुद्धिजीवी, संघर्ष-चेतना से संपन्न राजनीतिक कार्यकर्त्ता व शरणार्थी शिविरों में घुट घुट कर सांस ले रही आम जनता की भागीदारी रही है, जो आज के छद्म और क्षुद्र स्वार्थों के युग में अकेला पड़ते हुए भी संबल देती है। कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविता पंक्ति हैं

मुझे प्राप्त है जनता का बल
वो बल मेरी कविता का बल
मैं उस बल से शक्ति प्रबल से
एक नहीं सौ साल जियूँगा।

इसीलिए मैंने उन तमाम अपने प्रिय प्रगतिशील कवियों, रचनाकारों बुद्धिजीवियों की परवाह नहीं की जो मेरे विस्थापन और (इस) जीनोसाइड पर चुप रहे। यह टीस मुझे अन्दर ही अन्दर सालती रही है। अभिव्यक्ति के सारे खतरे लगातार उठाते हुए चरम यातना के क्षणों में भी मेरी आस्था, मेरा सौन्दर्य मरा नहीं। प्रतिक्रिया वादी बना नहीं अपितु एक अद्भुत दीप्ति से चमक उठा है, जो कि एक संघर्ण रत रचनाकार से अपेक्षित होता है। मैं पाबलो नेरूदा, बरतोत ब्रेख़्त से ले कर क़ाज़ी नज़रुल इसलाम से निराला तक कवियों से प्रेरित व्यक्ति हूँ।

पनुन कश्मीर की उत्पत्ति कैसे हुई? इसे कई लोग उतना ही सांप्रदायिक मानते हैं जितना कश्मीर का मुस्लिम अलगाववाद। आप का इस के विषय में क्या कहना है?

अलग होमलैंड की मांग साम्प्रदायिक नहीं धर्म-निरपेक्ष है। साम्प्रदायिक तो समूचा आतंकवाद, अलगाववाद और उसके समर्थक हैं।

मैं पनुन कश्मीर का स्वप्न दर्शी हूँ। मैंने अपने चन्द मित्रों के साथ इस को सोचा, बुना और खड़ा किया। इस में कश्मीरी विस्थापितों के उन तमाम अधिकारों की आग्रहपूर्वक बात की जो उन से छिन चुके थे, भूमि की बात की, अनुभवों की बात की। भविष्य की अपने लिए शासन की बात की, भारतीय संविधान की निर्बाध बहाली की बात की, इसीलिए होमलैंड के साथ केन्द्र शासित क्षेत्र की बात की, जहाँ वे सब लोग निश्शंक और निर्भय हो कर सम्मान के साथ रह सकें जिन का विश्वास भारतीय लोकतन्त्र और धर्म-निरपेक्षता, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता में हो। चूँकि कश्मीर में धर्म-निरपेक्षता की धज्जियाँ उड़ाई गई हैं, सह-अस्तित्व को नकारा गया है, अतः वहाँ के मूल नागरिक होने के नाते हमारा अधिकार बनता है कि हम वहाँ जा कर अपने रंग-ढंग से रह सकें। इसीलिए हम ने अलग होमलैंड की मांग की। यह मांग साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि धर्म-निरपेक्ष है। जबकि समूचा आतंकवाद, अलगाववाद और उसके समर्थक साम्प्रदायिक हैं। इसीलिए मैंने कहा पनुन कश्मीर धर्म-निरपेक्षता की नर्सरी है।

कांगड़ी

डॉ अग्निशेखर की एक कविता

Kangri

जाड़ा आते ही वह उपेक्षिता पत्नी सी
याद आती है
अरसे के बाद हम घर के कबाड़ से
उसे मुस्कान के साथ निकाल लाते हैं
कांगड़ी उस समय
अपना शाप मोचन हुआ समझती है
उस की तीलियों से बुनी
देह की झुर्रियों में
समय की पड़ी धूल
हम फूँक कर उड़ाते हैं
ढीली तीलियों में कुछ नई तीलियाँ भी डलवाते हैं।

वह समझती है
कि दिन फिरने लगे हैं
हम देर तक रहने वाले कोयले पर
उस में आंच डालते हैं
धीरे धीरे उत्तेजित हो कर
फूटने लगता है उस की देह से संगीत
जिसे अपनी ठंड की तहों में
उतारने के लिए हम
उसे एक आत्मीयता के साथ
अपने चोगे के अन्दर वहशी जंगल में लिए फिरते हैं।

और जब रात को बुझ जाती है कांगड़ी
हम अनासक्त से हो कर
उसे सवेरे तक
अपने बिस्तर से बाहर कर देते हैं
कांगड़ी अवाक् देखती है हमें रात भर
आदमी हर बार
ज़रूरत के मौसम में उसे फुसलाता है
परन्तु नहीं सोचता कभी वह
उलट कर उस के बिस्तर में
भस्म कर जाएगी सदा की बेहूदगियाँ।

पनुन कश्मीर के मार्गदर्शन मांगपत्र में मांग की गई है कि वितस्ता (झेलम) के पूर्व एवं उत्तर का भाग एक केन्द्र शासित प्रदेश रूप में बनाया जाए और वहाँ कश्मीरी हिन्दुओं को बसाया जाए। क्या आप को यह सुझाव व्यावहारिक लगता है?

पिछले लगभग दो दशकों से विश्व का भू-राजनैतिक घटनाक्रम जिस तेज़ी के साथ स्थापित मानचित्र बदलता हुआ चला है उसे देखते हुए क्या मैं आप से पूछूँ कि क्या सोवियत रूस का टूटना संभव था? टूट कर नए देशों का बनना, बर्लिन की दीवार का गिरना? इसी तरह आज़ाद कश्मीर में पाकिस्तान का बनना, अलग इस्लामी गणतन्त्र का बनना? कश्मीर को वहाँ के मूल निवासी हिन्दुओं से विहीन करना संभव है, तो विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए चंडीगढ़ सरीखा एक विशाल गृहराज्य बनना संभव क्यों नहीं? यह दरअसल एक राष्ट्रीय मुद्दा है, संकीर्ण और कश्मीरी पंडितों तक सीमित नहीं।

कश्मीर के मुद्दे का अन्तिम निदान कब और कैसे होगा, आज की तारीख में उस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। जब भी ऐसा होगा, उस समय हमारे भू-राजनैतिक अधिकारों की अनदेखी घातक सिद्ध होगी। कश्मीर में कश्मीरी हिन्दुओं का वापसी कश्मीरियत की वापसी है, उसकी परंपरा की वापसी है, उसकी विरासत की वापसी है, और इसे वृहत् भारतीय सांस्कृतिक परिपेक्ष्य में देखें तो यह हमारे जीवन मूल्यों की वापसी है।

आप के लेखन और कविता में किसी और चीज़ से अधिक अपने सामुदायिक निष्कासन की छाप क्यों दिखती है?

दुर्भाग्य से निर्वासन हमारी नियति बन गई है। यह निर्वासन देश विभाजन के बाद की सब से बड़ी मानवीय त्रासदी है। इसने एक जीवन्त और उज्जवल संस्कृति को धूल फांकने पर विवश किया है और उसके रेशे रेशे को बिखेर दिया है। और नई चुनौतियों, नए अनुभवों और नए वस्तुसत्य को सामने ला खड़ा किया है। यह वस्तुसत्य हमें यहूदियों के ऐतिहासिक वस्तुसत्य से जोड़ता है। आप हमारे निर्वासन में लिखे गए साहित्य में कई चौंका देने वाली समानताएँ देखेंगे। (आप इसे) यहूदी साहित्य में विस्थापन के साथ, फिलिस्तीनी साहित्य में दुर्द्धर्श आकांक्षा के साथ, अश्वेत साहित्य में आए नस्ल भेद के साथ, अरबी साहित्य विशेषकर सीरिया में 1967 की अरब पराजय के बाद की मानसिकता के साथ, मिला कर देख सकते हैं।

आप यहूदा आमिखाई, महमूद दरवेश, इब्बार रब्बानी, बेंजामिन मोलोइस जैसै अनेक प्रतिनिधि कवियों को पढ़िए, यह वस्तु सत्य भारतीय साहित्य में एक नया अध्याय है। इसे आप लाख चाहें झुठला नहीं सकते। कब तक झुठलाएँगे?

कश्मीर के अल्पसंख्यक समुदाय में हमेशा से ही कारगर नेतृत्व का संकट रहा है। ऐसे में पनुन कश्मीर ने इस समुदाय के इतिहास में एक नया युग आरंभ किया था। फिर एक बड़े जन समर्थित आन्दोलन का स्थान एक विभाजित संगठन ने ले लिया। ऐसा क्यों हुआ?

हर क्रान्ति एक प्रतिक्रान्ति की भूमि तैयार करती रहती है। इस में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ, स्वार्थ और अहं भी सक्रिय हो जाते हैं।

हर क्रान्ति एक प्रतिक्रान्ति की भूमि तैयार करती रहती है। इस में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ, स्वार्थ और अहं के अतिरिक्त कुछ बाहरी हाथ भी सक्रिय हो जाते हैं। वे तमाम शक्तियाँ भी सक्रिय हो जाती हैं जो आप को अपना शत्रु मानने लगती हैं। पनुन कश्मीर जब पहली बार टूटा (1993 में) तो उस में संघ के कार्यकर्त्ताओं की भूमिका थी। उन की समझ से पनुन कश्मीर और जे.के.एल.एफ. में कोई अन्तर नहीं था। इसलिए अग्निशेखर के नेतृत्व से आशंकित हो कर कुछ लोगों ने जो प.क. में सक्रिय थे, यह कर दिखाया। दूसरी बार 1996 में कुछ और साथियों ने कुंठाओं, पूर्वाग्रहों तथा महत्वाकांक्षाओं के चलते हम से विदा ली और अपनी अलग दुकान खोल ली। सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना संपन्न अग्निशेखर के नेतृत्व में खालिस राजनीतिक एजेंडा चलाना उन्हें कारगर नहीं लगा। मुंशी प्रेमचन्द के शब्दों में कहूँ तो साहित्य राजनीति की मशाल होती है। मुझे इस का उलट मंज़ूर नहीं था। जिस तरह का आन्दोलन हम चला रहे हैं, उस की अनिवार्यता है कि वह आम जनता से जुड़े और उस की दैनन्दिन समस्याओं से जुड़े, सांस्कृतिक आकांक्षाओं से जुड़े और उन से अपने राजनैतिक मुद्दे के लिए बल संचय करे।

मैं पारदर्शिता, आधारितभूत संरचना और जवाबदेह संगठनात्मक ढ़ांचे में विश्वास रखता हूँ, इसलिए भी टूटा। जहाँ तक एकीकरण की बात है, मैं ने भी अपनी ओर से तथा अपने साथियों की ओर से (अपने धड़े को) एक साल तक भंग किया, और बिना शर्त किसी भी भावी प्रारूप और नेतृत्व के लिए स्वयं को समर्पित रखा। अभी तक एकीकरण नहीं हो पाया है, परन्तु प्रसिद्ध कवि दीना नाथ नादिम के शब्दों में

मुझे है आस कल की
कल प्रज्वलित होगी दुनिया।

आप की लिखी कहानी "मेरी ज़मीन" पर एक फिल्म शीन का निर्माण हुआ, जो ज़्यादा नहीं चली। इस फिल्म ने आप की कहानी और आप के समुदाय की कहानी के साथ कितना न्याय किया?

शीन मेरी कहानी पर बनी, पर बॉलीवुड की अब तक की सब से खराब फिल्मों में से एक है। एक साहित्यकार के नाते अपनी कहानी पर फिल्म बनने की प्रक्रिया में मेरे जो अनुभव हैं, वे प्रेमचन्द, अमृतलाल नागर, फणीश्वरनाथ रेणु, आदि से भिन्न नहीं हैं। वास्तव में साहित्य और फ़िल्म का आत्मीय संबन्ध और संवाद आज तक बना ही नहीं। साहित्य जहाँ एक स्वायत्त एकक है जहाँ साहित्यकार और उस का सृजन होता है, वहीं फिल्म एक ऐसा समुद्र है जहाँ तरह तरह की कला विधाएँ आ कर जा मिलती हैं। एक कुशल अनुभवी और दृष्टिसंपन्न निर्देशक ही सफल रूप से इन सब का समावेश कर सकता है। फिल्म माध्यम ही निर्देशक का है। हालाँकि मैं महेश भट्ट, अनुपम खेर, नसीरुद्दीन शाह की अपनी कहानी को ले कर उन की राय से बहुत उत्साहित था। महेश भट्ट का तो कहना था कि अगर अशोक पंडित मेरी कहानी को सही ढ़ंग से फिल्मा सके तो यह कान तक में जा सकती है। खैर छोड़िए…

कश्मीर के विषय में हुई बैठकों आदि में आप का वास्ता इस मसले से जुड़े नेताओं से पड़ा है, और आप बता रहे थे कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति के साथ भी आप का सीधा सामना हुआ है। उस के विषय में बताएँ।

मुशर्रफ बहुत ही होशियार और चालाक राजनेता और सैन्य तानाशाह हैं, जो हर लिहाज़ से भारतीय नेतृत्व पर भारी पड़ते हैं।

जहाँ तक मुशर्रफ साहब की बात है, वे बहुत ही होशियार और चालाक राजनेता और सैन्य तानाशाह हैं, जो हर लिहाज़ से भारतीय नेतृत्व पर भारी पड़ते हैं। वे शान्ति बातचीत की बात भी करते हैं, अपनी धरती को आतंकवादियों द्वारा इस्तमाल नहीं करने देने की बात भी करते हैं, और इस के विपरीत आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर, मूलभूत संरचना बनाए रखने में भी अपनी भूमिका निभाते हैं। कश्मीर के मामले में खुल्लमखुल्ला दख़लअन्दाज़ी करते हैं और वज़ीरिस्तान में अपने लोगों पर बम वर्षा पर भारत के टिप्पणी करने पर इस्लामाबाद से डाँट लगाते हैं, "India should mind its own business". उन्होंने विश्व बिरादरी में वर्दी में होने को बावजूद अपनी एक प्रगतिशील और लचक वाली छवि गढ़ ली है, और self rule, demilitarization और joint control जैसे नए शगूफे छोड़ कर पुरानी ही शराब को नई बोतलों में पेश किया है। मेरी आगरा सम्मेलन के दौरान प्रधान मन्त्री के महाभोज में उन के साथ मुठभेड़ हुई है। मैं ने उन्हें कश्मीर की विनाश लीला, कश्मीरी पंडितों के निष्कासन और जीनोसाइड के लिए सीधे ज़िम्मेदार ठहराया था और आस पास खड़े सभी दिग्गज नेता (वाजपेयी जी, आडवाणी, मुलायम सिंह जी, आदि) दंग रह गए थे। तब परवेज़ मुशर्रफ ने स्थिति को संभालते हुए कहा था, "कुछ तो करना होगा…, कुछ तो करना पड़ेगा भई…"।