निधि

क्या आप टैगिंग करते हैं?

अंतर्जाल के विहंगम आकार के लिये वर्गीकरण की नई पद्धति है टैगिंग

टैगिंग जानकारी की जमावट और लोगों को जोड़ने का एक नया क्राँतिकारी माध्यम है जो अराजकता से व्यवस्था की सृष्टि कर मानवीय भावनाओं का प्रतीक भी बन चला है। देबाशीष चक्रवर्ती के आलेख द्वारा प्रवेश कीजिये कीवर्ड के साम्राज्य में और अंदाज़ा लगाईये टैगिंग के भविष्य का।

May 23rd 2005

मनोचिकित्सा से फ़िल्म निर्देशन तक

July 12, 2008 | Leave comment

image डॉ परवेज़ इमाम ने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी कर मनोचिकित्सक का पेशा अपनाया पर अस्पताल की बजाय उनकी कर्मभूमि बनी वृतचित्र यानि डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों की दुनिया। टीवी कार्यक्रम टर्निंग प्वाईंट से शुरुवात कर उन्होंने अब तक अनेकों पुरस्कृत वृत्तचित्रों का निर्माण किया है। संवाद में पढ़ें परवेज़ के जीवन और अनुभव पर डॉ सुनील दीपक से हुई उनकी बातचीत। लेख पढ़ें »
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नारियल का मिर्ची के साथ गठबंधन

July 1, 2005 | 1 Comment

बंगलौर में नारियल की चटनी में इतनी मिर्ची क्यों डालते हैं? तोगडिया जी हमेशा गुस्से मे क्यों रहते है? आग लगने पर ही पानी भरने की याद क्यों आती है? जब ये सवाल पूछे गये हैं फुरसतिया से तो भई जवाब भी मजेदार ही होंगे, फुरसतिया स्टाईल. लेख पढ़ें »
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जादुई तकनीक का वामनावतारः आईफ़ोन

February 9, 2007 | 1 Comment

image जनवरी में एप्पल ने कैमरा फ़ोन, पीडीए, मल्टीमीडिया प्लेयर व बेतार संचार प्रणाली से लैस आईफ़ोन के आगमन का शंखनाद किया। नये स्तंभ टेक दीर्घा में ईस्वामी जानकारी दे रहे हैं इस इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की जिसकी "एक क्रांतिकारी और जादुई उत्पाद" के रूप में हर तरफ चर्चा है। लेख पढ़ें »
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ट्रैफ़िक जाम और सपने

August 1, 2005 | Leave comment

image सारांश में इस बार एक महिला लेखिका के प्रथम उपन्यास के अंश प्रकाशित करते हुए हमें हर्ष है। सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सुषमा जगमोहन के इस प्रयास "ज़िंदगी ई-मेल" का 28 जुलाई, 2005 को दिल्ली में विमोचन हुआ। सुषमा पेशे से पत्रकार हैं और उनकी रचनायें हंस, मधुमती व सखी जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। लेख पढ़ें »
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भारतीय समाज और भ्रष्टाचार

July 1, 2005 | Leave comment

image क्या भ्रष्टाचार हम भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है? क्या हम कभी इससे स्वतंत्र हो पाएँगे? अन्तर्जाल पर किसका वर्चस्व रहेगा गुंडों मवालियों का या उनका जो रचनात्मक कार्य करते हैं, नए रास्ते खोलते हैं? इन दोनों मुद्दों पर पढ़ें निरंतर के जुलाई २००५ अंक की संपादकीय राय. लेख पढ़ें »
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पल में कोला, पल में तमाशा

November 4, 2006 | Leave comment

image कोला में कीटनाशक पाये जाने के बाद कोई कहता है कि एमएनसी विकासशील देशों में निम्नतर स्वास्थ्य मानक चलने देतीं हैं, तो कोई एनजीओ पर शक करता है। क्या "एकीकृत खाद्य सुरक्षा व मानक अधिनियम" द्वारा आनुवांशिक इंजीनियरिंग से विकसित खाद्य पदार्थों के भारतीय बाजारों में प्रवेश के चोर दरवाजे खुल गये हैं? पढ़िये अफलातून देसाई और अर्जुन स्वरूप की रोचक बहस। लेख पढ़ें »
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आईए फायरफॉक्स अपनाएं – 1

March 29, 2005 | Leave comment

image निधि में प्रस्तुत होगी जाल और चिट्ठाकारी के तकनीकी मुद्दों पर चर्चा और आलेख। इस अंक में पंकज नरूला की कलम से फायरफॉक्स के प्रयोग पर रोचक लेख का पहला भाग जिसमें सीखें टैब्ड ब्राउज़िंग के गुर। लेख पढ़ें »
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अंगने की होली

April 9, 2005 | 1 Comment

"न जाने कितने त्यौहार चुपचाप खिसक जाते हैं कालनिर्णय रसोईघर की भीत पर टंगा-टंगा। सब त्योहारों के नाम कान में बुदबुदाता रहता है...मन मामा के आँगन में उस त्यौहार को मना आता है।" वातायन में पढ़िये डॉ रति सक्सेना रचित मार्मिक संस्मरण "अंगने की होली"। लेख पढ़ें »
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बोलबाला मीडिया रिच चिट्ठों का

April 9, 2005 | Leave comment

image याहू 360° का आगमन, याहू द्वारा फ्लिकर के अधिग्रहण की अफ़वाहें, पत्रकार प्रद्युम्न माहेश्वरी के प्रसिद्ध ब्लॉग मीडियाह पर टाईम्स आफ इंडिया ने लगवाया ताला और आस्कर अवार्ड्स ने भी बनाया अपना ब्लॉग। ये, और ढेर सारी और खबरें। हमारे स्तंभ हलचल में पढ़िए माह के दौरान घटित ब्लॉगजगत से संबंधित खबरें तड़के के साथ। लेख पढ़ें »
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सुक्खी जैसा कोई नही

April 8, 2005 | 1 Comment

जितेन्द्र के बचपन के दोस्त सुक्खी बहुत ही सही आइटम हैं। उनकी जिन्दगी में लगातार ऐसी घटनायें होती रहती हैं जो दूसरों के लिये हास‍-परिहास का विषय बन जाती है। हास परिहास में पढ़िए सुने अनसुने लतीफ़े और रजनीश कपूर की नई कार्टून श्रृंखला "ये जो हैं जिंदगी"। लेख पढ़ें »
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